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उत्तराखण्ड की प्रसिद्व महिलाए

Byd4world

Aug 9, 2022


उत्तराखण्ड राज्य में कई विरागनाएं पैदा हुई जिनमें से कुछ प्रमुख हैं, समय-समय पर इन्होंने उत्तराखण्ड के लिए अपना योगदान दिया और दूसरों के लिए मिशाल बन गई, बागेश्वर में जन्मी बिशनी देवी ने छोटी सी उम्र (19-20 वर्श) में में मचों से ओजस्वी स्वर में राश्ट्र-प्रेम के गीत गाया करती थी। पिथौरागढ़ जिले की तुलसी देवी ने सरला बहन से प्रेरणा लेकर कताई-बुनाई केन्द्र एंव ऊन गृह उद्योंग-समिति के माध्यम से निराश्रित, असहाय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया। स्थानीय सामाजिक गतिविधियों, नारी उत्पीड़न, कुरीतियों, नशा मुक्ति, शिक्षा आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली दीपा देवी (टिचरी माई) थी। सामाजिक चेतना जागृत करने के लिए टिहरी निवासी सुश्री मंगलादेवी उपाध्याय का सक्रिय योगदान रहा।
उत्तराखण्ड की महिलाओं ने राश्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु समाज में प्रचलित कुरीतियों तथा अंधविश्वासों के उन्मूलन, वनों की सुरक्षा के लिए सदा तत्पर रही जिस कारण इन्होंने चिपकों आन्दोलन चलाया, सामाजिक चेतना एंव शराब के खिलाफ उन्होंने लगातार मोर्चा खोल रखा था। राश्ट्रीय आन्दोलन में यहॉ की महिलाओं ने अभूतपूर्व योगदान दिया।

रानी कर्णावती : – गढ़वाल के राजा महीपति शाह की रानी थी जिसे गढ़वाल के इतिहास में प्रसिद्व वीरागंना और नीति कुशल रानी के नाम से जाना जाता है।
तत्कालीन समय में मुगलों से एक युद्व में मुगल सेना के अधिकांश सैनिक मारे गये रानी के आदेश पर शेश मुगल सैनिकों के नाक-कान काट कर उन्हें भागने को मजबूर कर दिया गया। रानी कर्णावती तभी से नाक काटी राणी नाम से प्रसिद्व हो गई।

तीलू रौतेली : चौन्दकोट गढ़वाल में जन्मी अपूर्व शौर्य, संकल्प और साहस की धनी
इस वीरांगना को गढ़वाल के इतिहास में झासी की रानी के नाम से जाना जाता है।
15 से 22 वर्श की आयु के मध्य 7 युद्व लड़ने वाली तीलू रौतेली सम्भवतः विश्व की
एकमात्र वीरांगाना हैं।

टिंचरी माई : गढ़वाल में शराब विरोधी आन्दोलन एंव शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका। टिचरी माई का जन्म ग्राम मंज्यूर तहसील थलीसैंण में तथा विवाह ग्राम गवांणी, ब्लाक पोखड़ा पौड़ी गढ़वाल के हवलदार गणेशराम नवानी से हुआ था। जो द्वितीय विश्व युद्व से शहीद हो गये थे। परिवार से विरक्त होने पर ये जोगन बन गई मगर सामाजिक कार्यो में अपने योगदान के लिए सारे गढ़वाल में प्रसिद्व हुई। इनका वास्तविक नाम दीपा देवी था। गांव में यह ठगुली देवी के नाम से जानी जाती थी। और इच्छागिरी माई के नाम से भी इन्हें जाना जाता था। इन्होंने सामाजिक कुरीतियों तथा धार्मिक अन्धविश्वासों का डटकर मुकाबला किया। गढ़वाल में पचास-साठ के दशक में आयुर्वेद दवाई के नाम पर बिकने वाली शराब (टिंचरी)की दुकानों को बन्द कराने तथा बच्चों की शिक्षा विशेशकर बालिकाओं की शिक्षा के लिए कई स्कूलों का निर्माण कराने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

गौरा देवी : चिपको आन्दोलन की प्रथम सूत्रधार महिला, 19 नवम्बर 1986 में प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित हुई। गौरा देवी ने वनों की रक्षा के लिए अपने प्राण दाव पर लगा दिये थे। वनों से कटने से बचाने के लिए इन्होंने एक अभियान चलाया इस तरह इन्होंने पेड़ो को कटने से बचाया।
प्रो0 सुशीला डोभाल : वे 1958 में महादेवी कन्या डिग्री कॉलेज देहरादून की प्राधानाचार्य बनी। 1977 में पहली बार और 1984-85 में वह दूसरी बार गढ़वाल विश्वविद्यालय की कुलपति बनीं। इन्हें उत्तराखण्ड की प्रथम महिला कुलपति होने का गौरव प्राप्त है।


आइरिन पन्त : इनका जन्म डेनियल पन्त के घर मल्ला कसून, अल्मोड़ा में हुआ। इनका विवाह पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ हुआ। वे 1954 में नीदरलैण्ड में पाकिस्तान की राजदूत रही। राजदूत और गर्वनर पद पर पहुचने वाली वे पाकिस्तान की प्रथम महिला थी। इनको मदर ऑफ पाकिस्तान, वूमन ऑफ द वर्ल्ड (1965) तथा सयुंक्त राश्ट्र संघ के मानवाधिकार पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

बछेन्द्री पाल : भारत की प्रथम महिला एवरेस्ट विजेता का जन्म 24 मई 1954 को हुआ, 1985 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।

श्रीमती बसन्ती बिश्ट : ऐतिहासिक वीर गाथाओं तथा जागर गायकी में वे उत्तराखण्ड की एकमात्र महिला गायिका है।

कबूतरी देवी : पिथौरागढ़ जिले के ग्राम क्वीतड़ निवासी लोक गायिका कबूतरी देवी का जन्म काली कुमाऊॅं के लेटी गॉव में हुआ। इनके लखनऊ और नजीबाबाद आकाशवाणी केन्द्रों से गाए गीत बहुत लोकप्रिय हुए।
विजया बड़थ्वाल : वर्श 2009 में उत्तराखण्ड विधानसभा की प्रथम उपसभापति चुनी गई। इसके बाद इनको राज्यमत्री से भी नवाजा गया और बाद में कैबिनेट मंत्री भी बनी।


गौरा पंत ‘‘शिवानी’’
17 अक्टूबर 1923 को राजकोट, गुजरात में एक कुमाउनी परिवार में हुआ। प्राथमिक शिक्षा अल्मोड़ा में तत्पश्चात् उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई। रवीन्द्रनाथ टैगोर के सानिन्ध्य में शान्ति निकेतन में भी शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही साहित्यिक रचनाओं का सृजन किया। उन्होंने कुमाउंनी लोकजीवन के माध्यम से आम व्यक्ति की भावनाओं एंव सवेदनाओं का चित्रण बखूबी किया है। उन्होंने 30 उपन्यास, 13 कहानी संग्रह और 8 संस्मरण लिखे हैं। विशकन्या, कैंजा, चौदह फेरे, भैरवी, करिए छिम्मा एवं गहरी नींद उनकी प्रसिद्व कृतियां हैं। उन्हें भारतेन्दु हरिशचन्द्र सम्मान (1979), पदमश्री (1981), महादेवी वर्मा सम्मान (1994) सुब्रमण्यम सम्मान (1995) हिन्दी सेवा निधि राश्ट्रीय पुरस्कार (1997)सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार इनको प्राप्त हुए हैं। सन् 2003 में इनका देहवासन हो गया है।

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